
विश्वविदलय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13 जनवरी 2026 को घोषित नए नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है,
बीबीसी हिंदी के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस फैसले में रोक लगाते हुए कहा है कि, “यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026″ में अस्पष्टता नजर आती है और भविष्य में इस कानून का दुरुपयोग होने की पूरी संभावना है। साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को एक नोटिस जारी किया है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस कानून को दोबारा ड्राफ्ट करने के लिए कहा है।
क्या है मामला
जैसा कि हम जानते ही हैं कि, विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध महाविद्यालयों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग रेगुलेट करता है, साथ ही केंद्र सरकार की सिफारिश और सलाह के आधार पर दिशा-निर्देश भी तैयार करता है, अपने इसी क्रम में यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम लागू किए थे, इसका नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन) दिया गया था, यह नियम इसी विषय पर बनाए गए 2012 के नियमों की जगह लेता है।
नये नियमों में क्या कहा गया है
यूजीसी द्वारा लाया गया यह कोई नया कानून नहीं है, यही कानून 2012 में भी लाया गया था जिस पर भी खूब बवाल हुआ था, लेकिन 14 साल की वनवास यात्रा के बाद संशोधन किए गए इस विनियम में सिर्फ परिभाषा बदली है, लेकिन यही परिभाषा है जो सामान्य वर्ग को खटक रही है।
दरअसल, 2012 में यूजीसी के जिस नियम को परिभाषित करते हुए, “भेदभाव” की बात कही गई थी, वहीं संशोधित नियमों में “जाति आधारित भेदभाव” का नाम दिया गया है।
इन नियमों के तहत, जाति आधारित भेदभाव में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा दिव्यांगजनों के विरुद्ध किए जाने वाले भेदभाव को परिभाषित किया गया है।
साथ ही इन्हीं नियमों में कहा गया है कि, प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज को अपने स्तर से “समता अवसर केंद्र” के हेल्प डेस्क बनाने होंगे, जिसमें पीड़ितों का शिकायत निवारण किया जाएगा।
साथ ही इस केंद्र का काम वंचित समुदायों के हितों से जुड़ी योजनाओं पर नज़र रखना, छात्रों और कर्मचारियों को पढ़ाई, सामाजिक मामलों और पैसों से जुड़ी सलाह देना, परिसर में विविधता और सबको साथ लेकर चलने का माहौल बढ़ाना और ज़रूरत पड़ने पर ज़िला और राज्य की कानूनी सेवा संस्थाओं की मदद से कानूनी सहायता उपलब्ध कराना होगा।
यूजीसी द्वारा अनुबंधित नए नियमों में कहा गया है कि, विश्वविद्यालय तथा कॉलेज, उनमें पढ़ने वालेछात्रों और वहां काम करने वाले लोगों को सामाजिक और जाति के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव से निपटने के लिए कदम उठाने होंगे।
साथ ही जाति, समुदाय, धर्म, भाषा, जातीय पहचान, लिंग या विकलांगता के आधार पर किसी के प्रति कोई पक्षपात न करते हुए उनके हितों की रक्षा करनी होगी।
विरोध प्रदर्शन करने वालों का तर्क
विरोध करने वालों का तर्क है कि यह नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ हैं और उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे लगाए जा सकते हैं, जो उनके भविष्य की दिशा को भी बदल सकते हैं।
साथ ही नए नियमों के तहत बनाई जाने वाली “समता समिति” में सामान्य वर्ग को छोड़कर लगभग सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व की बात कही गई है, जो उच्च वर्ग को रास नहीं आ रही है।
भारत के ज्यादातर राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और खुद केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसमें अंदर से भी इस कानून के विरोध में आग सुलग रही है।
इतना ही नहीं, इन नये नियमों के विरोध में कई बड़े अफसरों, कर्मचारियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है, वहीं भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी इसको लेकर दो टूक हो गया है, तथा वहां से भी स्तीफों की झड़ी लग रही है।
विरोध में क्या-क्या हुआ
इन नए नियमों का विरोध करने के लिए कई जगह ज्ञापन दिए गए तो कहीं जगह सड़क पर धरना प्रदर्शन भी किया गया, तथा कुछ किसान संगठनों और समूहों ने ‘1 फरवरी को भारत बंद’ का ऐलान किया है।
याद रहे कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को सामान्य वर्ग से 53% वोट गया था, जिसकी हुंकार देते हुए “अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा” के एक मंच ने यहां तक कह दिया कि अगर हम सरकार बना सकते हैं तो बादल भी सकते हैं।
दूसरी तरफ इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी, जिसमें कहा गया है कि,”ये नियम चुनिंदा संरक्षण प्रदान करते हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों से आने वाले छात्रों का एक बड़ा हिस्सा वंचित रह जाता है”, इसी पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल इस कानून पर रोक लगा दी है।।
यह ब्लॉग भी पढ़ें
व्हाट्सएप चैनल को ज्वाइन करें