मान्यवर काशीराम की 92वीं जयंती (विशेष जीवन दर्शन)

बहुजनों के संरक्षक और हितकारी ‘मान्यवर श्री काशीराम जी का आज जन्म दिवस’ है,

जो पूरे देश में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है,

उनका जन्म आज ही के दिन पंजाब राज्य के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में 1934 में हुआ था,

वे सिख रविदासिया नाम के दलित समुदाय से ताल्लुक रखते थे,

उन्होंने बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी जैसे राजनीतिक संगठनों की स्थापना की,

इसका उद्देश्य विशेषकर दलितोद्धार और सामाजिक और जातीय पाखंडवादी परंपराओं को तोड़ना था,

जीवन और बचपन

काशीराम जी का जीवन इतना चुनौतीपूर्ण और भेदभाव से ग्रसित नहीं रहा जितना आमतौर पर दलितों का होता है,

इसकी वजह यह थी कि, वे धर्म परिवर्तित सिख समुदाय से आते थे और सिख गुरुओं का अनुसरण करते थे,

क्रिस्टोफर जैफ्री लोड नाम के एक फ्रांसीसी राजनीतिक को उन्होंने 1990 के आसपास एक इंटरव्यू दिया था,

इसमें उन्होंने अपने साथ बचपन और युवा अवस्था में दलित के आधार पर न होने वाले भेदभाव का जिक्र किया था,

उन्होंने कहा था, ‘सिख गुरुओं की शिक्षाएं अधिक क्समतावादी थीं और

 धर्म परिवर्तित चमारों को कम से कम कुछ सामाजिक उन्नति का अवसर तो मिला’,

इस इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि सिख धर्म में परिवर्तित होने की वजह से उन्हें समानता का लाभ मिला,

शैक्षिक जीवन

काशीराम जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके गृह जिले रोपड़ से ही प्रारंभ और पूरी हुई,

इसके बाद उन्होंने ‘पटियाला जिले के राजेिंद्रा कॉलेज’ से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री 1956 में पूरी की,

वे विज्ञान के प्रबल छात्र थे और और विज्ञान में अत्यधिक प्रतिष्ठित रुचि रखने के चलते,

1958 में ईआरडीएल (जो अब डीआरडीओ का हिस्सा है) में सहायक वैज्ञानिक की नौकरी मिल गई,

राजनीतिक जीवन

उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत रक्षा अनुसंधान विभाग में कार्य करते हुए एक आंदोलन के दौरान हुई,

जब 1960 के आसपास विभाग ने अंबेडकर के जन्मदिवस के अवसर पर सार्वजनिक छुट्टी से इनकार कर दिया,

1964 में अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था और जाति व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलनों में सक्रिय होने लगे,

इसके बाद, उन्होंने 1978 में विभिन्न विभागों के दलित अधिकारियों और कर्मचारियों को एकजुट किया,

और ‘बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन’ बामसेफ नाम का संगठन बनाया,

विवादित नारे

उन्होंने ऐसे कई नारे दिए जो दलित उत्थान को बढ़ावा देते रहे और दलितों को इन नारों ने एकजुट भी किया,

उनका प्रसिद्ध नारा ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” बहुचर्चित नारा रहा है,

हालांकि, उनके कार्यक्रमों में ज्यादातर विवादित नारे दिए जाते रहे जो सवर्णोंं के प्रति आक्रमाता दर्शाते थे,

उनका एक नारा ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ इतना विवादित हुआ कि उनकी पार्टी से सवर्णोंं का मोह भंग हो गया,

लेकिन बाद में मायावती ने अलग-अलग योजनाओं के जरिए सवर्णों को खुश करने की कोशिश जरूर की, जिसका उनको लाभ भी मिला,

प्रमुख पुस्तक और सम्मान

उन्होंने एक बहुचर्चित पुस्तक “The Chamcha Age (चमचा युग)’ पुना पैक्ट की वर्षगांठ पर प्रकाशित की,

इसका उद्देश्य उन दलित नेताओं की आलोचना करना था जो अपनी जाति के प्रति वफादार नहीं थे,

उन्होंने, अपने समय तथा भविष्य में कोई भी पद्म पुरस्कार लेने से मना कर दिया और दलितोत्थान को अपना सर्वोच्च पुरस्कार बताया,

हालांकि, 2011 में उनके नाम से भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया था,

उनके नाम पर उत्तर प्रदेश में दो विश्वविद्यालय और कई महाविद्यालय बनाए गए जिनका अब नाम बदल दिया गया है।

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