सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला दिया है,
जिसमें बताया गया है कि धर्म बदलकर पहले के धर्म की जाति के आधार पर कोई शिकायत और कार्यवाही नहीं की जा सकती है,
मंगलवार 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के 2 जजों ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है, कि कोई ईसाई धर्म का व्यक्ति दलित नहीं हो सकता,
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है, कि कोई व्यक्ति जो पहले हिंदू था लेकिन अब ईसाई धर्म परिवर्तन कर लिया है वह दलित जाति में नहीं आ सकता है,
और ना ही हिंदू धर्म की दलित जाति का लाभ उठाकर अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत शिकायत कर सकता है,
क्या है पूरा मामला
यह मामला साल 2019 का है, जब आंध्र प्रदेश के एक व्यक्ति ने अनुसूचित जाति अधिनियम की धाराओं में मारपीट की शिकायत की थी,
चिंथड़ा आनंद नाम के एक व्यक्ति ने स्थानीय थाने में शिकायत की थी, कि संडे प्रेयर के दौरान कुछ लोगों ने उनके साथ मारपीट की,
शिकायतकर्ता ने शिकायत में बताया कि, उन्हें जाति आधारित गालियां भी दी गईं, जिसको आधार बनाकर उन्होंने इस अधिनयम के तहत शिकायत की,
शिकायत में उन्होंने अपनी मडिगा जाति का उल्लेख किया, जो आंध्र प्रदेश में अनुसूचित जाति समुदाय की श्रेणी में आता है,
आरोपी पक्ष का विरोध और हाई कोर्ट का फैसला

इसके बाद विरोधी पक्ष ने अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम की धाराओं को रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रूख किया,
आरोपी पक्ष ने दलील दी कि, शिकायतकर्ता एक पादरी है, जो कई वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रहा है,
आरोपी पक्ष की इस दलील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को हटा दिया,
अप्रैल 2025 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट किया कि, इन धाराओं में शिकायत सिर्फ संबंधित जाति का व्यक्ति ही कर सकता है,
जबकि शिकायतकर्त पादरी 10 वर्षों से ईसाई धर्म और उनके सिद्धांतों का पालन कर रहा है इसीलिए वह इसका हकदार नहीं है,
सुप्रीम कोर्ट में शिकायत और उसका फैसला
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए चिंथड़ा आनंद ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई चल रही थी,
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपना फैसला सुनाया,
हालांकि, याचिकाकर्ता चिंथड़ा आनंद ने दलील दी कि, जाति जन्म से होती है धर्म परिवर्तन से जाती नहीं बदलती,
सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी इस दलील को खारिज करते हुए 1950 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा,
संविधान में स्पष्ट किया गया है कि, हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही के तहत शिकायत कर सकते हैं।
