हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक 33 वर्षीय व्यक्ति को इच्छा मृत्यु की मंजूरी दे दी है,
यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कोर्ट में निर्देश दिया है कि,
इच्छा मृत्यु देते समय व्यक्ति के जीवन की गरिमा की रक्षा (अनुच्छेद 21) की जानी चाहिए।,
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई यह मंजूरी भारत के इतिहास में ऐतिहासिक निर्णय बन गया है,
कौन हैं हरीश राणा और क्या बोले उनके पिता
33 वर्षीय हरीश राणा पिछले 13 सालों से कोमा की स्थिति में है और उनके ठीक होने की अब कोई संभावना नहीं है,
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद हरीश राणा के पिता ने इसका स्वागत करते हुए, ‘अपने बेटे के हित में फैसला‘ बताया है,
साथ में उन्होंने यह भी कहा है कि, इससे आने वाले समय में उनके साथ भी न्याय होगा जो इस तरह की परेशानी से जूझ रहे हैं,
कैसे दी जाएगी मृत्यु
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया है कि, इसको सक्रिय इच्छा मृत्यु नहीं कहा जाना चाहिए,
मतलब, इनको किसी तरह के इंजेक्शन द्वारा मौत नहीं दी जाएगी, बल्कि उनका लाइव सपोर्ट सिस्टम हटा दिया जाएगा,
हालांकि दर्द निवारक दवाएं दी जाएगी और सब कुछ प्रकृति पर निर्भर होगा इससे उनकी स्वतह मृत्यु हो जाएगी,
पैसिव यूथेनेसिया और अरुणा शानबाग
कानूनी संदर्भ में पैसिव यूथेनेशिया से मतलब ऐसे व्यक्ति को उसकी गरिमा के अनुसार मृत्यु देना है,
जिसके पूरी तरह ठीक होने की कोई संभावना बिल्कुल नहीं है और वह लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर जिंदा है,
ऐसी स्थिति में उसके जीवन की गरिमा का सम्मान करते हुए लाइव सपोर्ट सिस्टम हटाकर दर्द-रहित मृत्यु दी जाती है,
पैसिव यूथेनेशिया के हक में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में फैसला सुनाते हुए सरकार से गाइडलाइन बनाने के लिए कहा था,
यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल की पूर्व नर्स के मामले में सुनाया था,
जब अरुणा शानबाग बलात्कार संबंधी मामले की सुनवाई चल रही थी, जो किसी भी हालत की स्थिति में नहीं थी,
दरअसल, 1973 में सोहनलाल नाम के वार्ड बॉय ने अरुणा शानबाग का बलात्कार करने के लिए उनका गला दबा दिया था,
जिससे वे 42 साल तक कोमा में रहीं, हालांकि अस्पताल के विरोध के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी यह याचिका खारिज कर दी थी,
हालांकि 42 साल तक कोमा में रहने के बाद 2015 में निमोनिया से उन
की मृत्यु हो गई थी,