आज दिनांक 21 मार्च 2026 और दिन शनिवार है, तो चलिए जानते हैं आज के दिन से जुड़ी हुई प्रमुख घटनाएं,
3000 यहूदियों का कतल-ए-आम 1349
इस घटना को ब्लैक डेथ के दंगे के नाम से जाना जाता है, जो जर्मनी के एरफर्ट शहर में हुई थी,
आरोप लगाया गया था कि, तत्कालीन समय में चल रही फ्लैग बीमारी को फैलाने के लिए यहूदियों ने कुओं में जहर मिलाया था,
इसके बाद भीड़ ने यहूदियों का सामूहिक दमन का शुरू कर दिया, इस घटना में यहूदियों को चुन-चुन-कर मारा गया,
कुछ परिवारों ने भीड़ के हाथों मरने के बजाय, अपने ही घरों में सामूहिक आत्मदाह कर लिया था,
हेनरी पंचम बने इंग्लैंड के राजा 1413
इनका शासन 1413 से 1422 तक रहा, जो सख्त, दमनकारी और न्यायपूर्णता से मिश्रित था,
हेनरी ने 1415 में एजनपोर्ट के युद्ध में फ्रांस की बड़ी सेना को अपनी छोटी सी सेवा के धनुष विद्या के दम पर ऐतिहासिक रूप से हराया था,
उत्तरी फ्रांस में लड़े गए इस युद्ध में हेनरी पंचम ने अपनेआप को न सिर्फ फ्रांस का उत्तराधिकारी घोषित कर लिया,
बल्कि सबसे बड़ी जीत यही हुई कि यहां पर फ्रेंच और लैटिन भाषा की जगह अंग्रेजी में ले ली,
बेंगलुरु में टीपू सुल्तान की हार 1791

1791 में आज ही के दिन टीपू सुल्तान को हराकर अंग्रेजों ने बेंगलुरु को अपने कब्जे में कर लिया,
यह घटना तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध की है जो 1790 से 1793 के बीच टीपू सुल्तान तथा दूसरी तरफ अंग्रेज, मराठों और निजाम के बीच लड़ा गया था,
जब अचानक 21 मार्च की आधी रात को अंग्रेजों ने बेंगलुरु की दीवारों पर ताबड़तोड़ हमला करके उसे तोड़ दिया,
इसके बाद ही श्री रंगपत्नम की संधि हुई जिसमें टीपू सुल्तान को अपना आधार राज्य गंवाना पड़ा,
कोलकाता में पहले सार्वजनिक पुस्तकालय की शुरुआत 1836
इस लाइब्रेरी का निर्माण प्रिंस द्वारिका नाथ टैगोर और जेएस स्टोगलव द्वारा करवाया गया था जो सबके लिए मुफ्त में उपलब्ध थी,
इसका उद्देश्य बिना किसी रंग रूप, जाति भेद और छुआछूत के सभी तक शिक्षा की पहुंच को मजबूत करना था,
यह लाइब्रेरी अंग्रेजों द्वारा बनाई गई विशेष लाइब्रेरी (जो उच्च वर्ग के लिए बनाई जाती थीं) से अलग थी, अब इसका नाम नेशनल लाइब्रेरी है,
लखनऊ में बागी सिपाहियों का आत्मसमर्पण 1858
लखनऊ में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने वाले सिपाहियों ने आज ही के दिन 1858 में आत्मसमर्पण कर दिया था,
क्योंकि अंग्रेजों ने लगभग लखनऊ को पूरी तरह से जीत लिया था, इसलिए विद्रोही सिपाहियों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था,
दूसरी तरफ उनकी महारानी बेगम हजरत महल भी, अपने कुछ वफादार सैनिकों और दो बेटों के साथ नेपाल चली गई थीं,
जिसके कारण विद्रोही सिपाहियों का हौसला टूट गया और उन्हें अपनी जागीरों से भी हाथ धोना पड़ा,
इसके बाद ज्यादातर सैनिकों को माफी का लालच और उनकी जागीरें वापस देकर हथियार डालने के लिए मना लिया गया,
