इसराइल लगातार अपनी युद्ध एवं रणनीतिक क्षमताओं को बढ़ता जा रहा है जो उसके विरोधियों के लिए खतरनाक है,
अपनी रणनीतिक और सैनिक क्षमताओं के आधार पर, हाल ही में उसने सीरिया और अब ईरान को अपना मकसद बता दिया है,
ज्यादातर मुस्लिम देश इसराइल का एक स्वतंत्र देश के रूप में विरोध करते हैं, इसी कारण इसराइल की अपनी सुरक्षा चिंताएं हैं,
राजनीतिक विशेषज्ञों और युद्ध व्यवस्था पर नजर रखने वाले विद्वानों के मन में अब सवाल उठ रहा है कि,
जिस तरह से तुर्की अमेरिका का सहयोगी होते हुए भी इसराइल का हर मोर्चे पर विरोध कर रहा है,
तो अब इसराइल की प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है?
इसका जवाब उसने अप्रैल 2026 में कुछ उदाहरणों के साथ पूरी दुनिया को समझा दिया है,
इसराइल द्वारा उठाए गए कुछ रणनीतिक कदम

Hexagon of Alliances नाम का एक 6 देशों का गठबंधन बनाए जाने की बात सामने आई है,
इस गठबंधन में, जो देश शामिल हैं उनके नाम: भारत, साइप्रस तथा कुछ चुनिंदा अरब और अफ्रीकी देश होंगे,
इस गठबंधन को बनाए जाने का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में तुर्की के प्रभाव को चुनौती देना तथा भविष्य में आने वाली चुनौतियों से निपटना है,
इसके अलावा, इसराइल, ग्रीस और साइप्रस के साथ मिलकर यूरोप में गैस पहुंचाने के लिए संयुक्त पाइपलाइन बना रहा है,
जिसका मकसद तुर्की को आर्थिक रूप से दरकिनार करना है, जो यूरोप को इसराइल की तरफ आकर्षित करेगा,
इसके अतिरिक्त, हाल ही में इसराइल के नेता नफ्ताली बैनेट ने तुर्की को नया ईरान बताते हुए उसे चुनौतीपूर्ण समस्या कहां है,
इसराइल का सैनिक हस्तक्षेप और तुर्की की चिंताएं

इसराइल लगातार तुर्की को किसी न किसी तरह से चुनौती देता जा रहा है, जैसे कि हाल ही में तुर्की को उसने नया ईरान कहा है,
इसके अलावा इसराइल द्वारा सीरिया के दक्षिणी भाग पर अपनी सैन्य मजबूती बढ़ाना तुर्की के लिए चिंता का विषय है,
हाल ही में इसराइल ने सीरिया के कुर्द समूह की रक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई है वैसे भी कुर्दों को तुर्की अपना दुश्मन मानता है,
और तुर्की इसराइल की इस हरकत को उकसावे की कार्यवाही बताते हुए इसका विरोध करता आ रहा है,
अमेरिका और भारत का क्या रूख होगा

सैन्य और रक्षात्मक रूप से अमेरिका इसराइल का बहुत बड़ा साझेदार है जबकि तुर्की अमेरिका का पारंपरिक साझेदार है,
यही कारण है कि, अमेरिका ना तो तुर्की से और ना ही इसराइल से अपने संबंध खट्टे कर सकता है बल्कि यहां पर वह मध्यस्थ बनेगा,
वहीं, भारत इस मामले में अप्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से भी इसराइल का समर्थन करने से पीछे नहीं हटेगा,
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि, तुर्की हमेशा कश्मीर को पाकिस्तान का अभिन्न अंग बताता रहा है,
और 7 मई 2025 को भारत द्वारा किए गए ऑपरेशन सिंदूर में तुर्की ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया और उसे ड्रोन उपलब्ध करवाएं,
यही कारण है कि, इस स्थिति में भारत इसराइल का खुलकर समर्थन अथवा तुर्की का विरोध कर सकता है।
